Saturday, April 15, 2017

एक जीवन ऐसा भी पाऊं,


एक कदम चलूँ तो धरती समेट  लूँ
एक गहरी सांस लूँ और हवाएं लपेट लूँ
जहाँ नज़र जाए, उस के अंतिम छोर तलक,
अदृश्य ब्रह्माण्ड में लीन अगिनित आकाश गंगाओं से
छन  कर आते मद्धिम, बिखरे, टूटे, लाचार संकेतों को
अपने अंतरतम के विशाल दालानों में विश्राम दूँ ।

जो एक टूटा तारा भी अपनी लकीर से हिले
जो सृष्टि का एक आवारा कण भी अनंत में विलीन हो
तो धड़कन बढ़ा  जाए
एक सूर्य जले
एक सूर्य बने नया
एक चाँद चमके ज़मीन पर,
एक चाँद कहीं पड़ा रहे, सदियों से सुस्ताये
नए रहस्य बनें, जो कभी पकड़ में न आएं
नए रहस्य खुलें जो, अब तक के ज्ञान को शर्माएं ।

कुछ नया देखूं , कुछ नया न पाऊं,
जो है, उसके अंत तक पहुंचूं,
पर पार  न जाऊं,
एक जीवन ऐसा भी पाऊं,
जब में जीव, निर्जीव के बीच खड़ा
ब्रह्माण्ड नापूं

और जब रौशनी हो,
तो मैं कौन, और रौशनी क्या?







Friday, March 31, 2017

तेरे निशाँ मिलने लगे

ढूंढने तो जाता रहा हर दिन,
चलता रहा उस तपिश में हर दिन
कभी ठिठक के ठहरा, तो कभी झिझक से चुप रहा
कहीं तेरा नाम पूछा, तो कहीं साये देख कर सिहर गया
कुछ बतियाये कुछ कसमसाये,
कुछ अनदेखा कर आगे बढ़ गए
दिन तो दिन थे, ढल गए , रातों में छाले और बढ़ गए।

मालूम तो था, मिलेंगे, पर कब होगा
क्या साथ लूँ , क्या छोड़ दूँ  कि सफर लंबा होगा
किस रूप में तू मिलेगी, कैसे मिलेगी, क्या होगा
नाम ही काफी होगा या युग-गान वर्णित होगा
सिर्फ प्रश्न थे,  और चलना था
सूरज से पूछे बिना, चाँद के आगे निकलना था।

पर कहीं तो मन थकने लगा, शरीर अकड़ने लगा,
प्रश्न अठखेलियों में बदलने लगे
और कदम शहर की गलियों में भटकने लगे
मन की उधेड़बुन अब ठहाकों में बदलने लगी
तेरी यादों के रोशनदानों में रौशनी कम  हुई
और कबूतर ज्यादा बैठने लगे.

जो दिखे नहीं वो कहाँ सवेरा?
जो मिले नहीं वो कहाँ है मेरा ?
सूक्ष्म सूख गया,
भीष्म गिर गया
शहर शहर रहा
मुसाफिर भटक गया.

पर शायद तुझे ये मंज़ूर न था
खुमारी तो थी, मगर चूर न था
रह रह के ठहाकों के बीच तेरी हूक सी उठती रही
भाग कर छत पर, कभी बहकता कभी सहमता,
कभी रोकर कभी चिल्ला कर,
कभी चुप चाप,
तेरी ओर फिर से चलने लगा

अब धीरे धीरे मंज़र बदलने लगे
जंगलों से मकानों में ,
फकीरों से, लकीरों में,
तेरे निशाँ मिलने लगे
मिलना, एक सम्भावना होने लगी
रूह से तेरे लिए
दुआएं फिर निकलने लगीं ।


अब ज़मीन से मीलों दूर,
मेरा सफर जारी है
उपकरण तो वही है
बदली सी कीमियाकारी है।

मैं नभ-गंगा के दूसरे छौर से,
जब तुम्हें तुम्हारे नाम से यकायक पुकारूँगा
तब तुम दौड़ी चली आओगी ना, मधुरिमा ?










Tuesday, November 29, 2016

जो ख्वाब मैंने बुने थे

जो ख्वाब मैंने बुने थे
वो काफी गहरे और घने थे ,
सहमे सहमे, एक छोटे से शहर से,
जहाँ दुपहर की धूप ठहरी हुई होती थी
और शाम तो सिर्फ दिन का समापन था,
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उनमें ऊँची उड़ाने तो थीं
पर इमारतों की काट छांट नहीं थी
उनमे एक दूसरे का साथ तो था
पर रिश्तों की बन्दर बाँट नहीं थी
रास्ते घुमावदार और सख्त भी दिखते थे
पर सिर्फ गाडी में ही जाया जा सके,
ये बात नहीं थी.
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रंग सिर्फ छह थे, वो भी टिकिया में आते थे
और वह भी जब पुराने ख़त्म हों, तभी नए आते थे
छह भी छह लाख, हो जाते थे
वो रंग, जब मेरे ख़्वाबों से मिल जाते थे
घर से स्कूल तक उनकी खुशबु मेरे ज़हन में रहती
कागज़ धुल जाते, पर दाग नहीं जाते थे ।
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अब किस कोशिश में ये ख्वाब रहते हैं
ऊँचे मकान में रहते हैं, या किसी आसमान में रहते हैं
नीचे भी लोग रहते हैं, इनसे क्यों बेगुमाँ रहते हैं
कभी उतरें तो जमीन पर दिखाई पड़े
हम कौन हैं, क्यों हैं, कहाँ रहते हैं।













ज़िन्दगी चलती गयी

जब साथ चलने की बात हुई
कुछ कही कुछ अनकही भी साथ हुई 
जितना क्षण में भर सकते थे
जितना मन में रख सकते थे,
उतना सब तो तोल दिया  
जितना अग्नि से सांझा था 
जितना रिश्तों  ने बाँधा था 
उनसे ऊपर भी बोल दिया !

धागे, तब तो सिर्फ धागे थे 
हम तो सपनों के भी आगे थे
कभी दौड़ पड़े, कभी हम-कदम रहे 
कभी ठिठक गए कभी सिसक गए 
कभी चमक गए, कभी बहक गए
ज़िन्दगी, ज़िंदगी थी , चलती गयी 
गरजती, पसरती, संभलती गयी  
कुछ मैं बदलता गया  
कुछ तुम बदलती गयी।

कभी सोचा तुमसे बात करूँ
आज करूँ कल रात करूँ. 
अब एक कहानी नयी बुनूँ 
या पुरानी ख़त्म करूँ । 
मन पर एक अनजान पहरा सा था 
या ये समय का साँचा गहरा था 
किस्से किस्से रहे, हकीकत, हम रहे
मौसम तो मौसम थे , 
कभी खुश्क, कभी नम रहे!

ज़िन्दगी सिर्फ बदन नहीं थी, की पिघल जाती
या ख्वाब और फिक्र नहीं, की बहल जाती
उसके अपने रास्ते थे और अपनी मंज़िले
हम तो मुसाफिर थे, चलते गए
दूरियां, नज़दीकियां जगह बदलती गयीं
कुछ मैं ढलता गया, कुछ तुम ढलती गयी। 
















Friday, August 29, 2014

कितने कितने पानियों में कश्ती जाती है
शाम होते ही रह रह के तेरी याद आती है
तन्हाई से रूबरू हो कर मन यूँ मचल जाता है
जैसे दिवार पे बैठा कबूतर फुर्र से उड़ जाता है।

Wednesday, May 28, 2014

SARWAR MEMORIES!!

बड़ी हवेली और बड़ी सी चौखट
रास्ते घुमावदार और बड़े तख़्त वाली बैठक
अंदर कदम रखते ही कुछ ठण्ड सी महसूस होती थी।
पुरानी हवली की वो पुरानी वाली खुशबु जो सिर्फ वहीँ मिला करती थी ।
दीवारों का प्लास्टर पथरीला सा था,
गावं के उन रास्तों  की तरह, जो हवेली से गुजरा करते थे।
उन ऊँची दीवारों में झांकते रोशनदान
जैसे मेरा ही रास्ता तकते थे ।

कच्चे आँगन वाला  गोबर और मिटटी से लीपा वो चौक,
जेहन गर्मियों की तेज धुप भी थोड़ी सुस्ता लेती थी
उस सन्नाटे में,
जो सिर्फ टूटता था, ऊपरी मज़िल पर तेजी से दौड़ते बच्चे की पदचाप से,
या फिर मेहमानों के आने से हुए कोलाहल से,
और ये लो! हो गई मनुहार की शुरुआत!

हम बच्चे हर वर्ष, हवली के अगिनत कोनों को सँभालते
उनमे रखी नयी, पुरानी और पौराणिक वस्तुओं को खंगालते
कुछ यादों से भरी, कुछ मिटटी से सनी,
कुछ डरावनी सी, कुछ सिर्फ सुनी सुनी।

कभी उन कमरों में झांकते, जहाँ कोई नहीं जाता
और सुनते की वहां एक खज़ाना हैं, जिस पर नाग देवता का पहर है,
कभी वो पुरानी गिल्ली ढूँढ़ते, जो मैंने ही बबूल की लकड़ी से बनाई थी,
उसके छीले हुए सिरों को देख कर
सब याद आ जाता था, की कुल्हाड़ी मैंने कैसे कैसे चलाई थी।

कभी पूजा कक्ष में पूजा से ज़्यादा वह रखी तलवार को देखते
छुपे छुपाए उसे म्यान से निकाल कर उसकी धार मापते
जंग लंगी तलवार को समझते शायद ये खून के धब्बे हों
और थोड़ा सारा युद्ध का माहोल सामने होता।

या फिर उसी पूजा कक्ष में गोंद के लड्डूओं की महक
 पूजा के बीच भी मन ललचाती थी,
"है भगवान माफ़ करना, बच्चा हूँ" ये समझ शायद, थोड़ा थोड़ा करके
पूरा डब्बा साफ़ करवा जाती थी ।

कभी सामने नीम के पेड़ की ऊँगली जैसी डाल पर
झूला डालने की होड़,
या उसकी छावं में चादर बिछा कर, पिकनिक की जोड़तोड़

ये सब सच था, स्वप्न नहीं था,
न था तो सिर्फ ये गुमाँ , की ये सब हमेशा के लिए नहीं है
नाना-नानी नहीं हैं, पर हवेली तो वही  है
गावं में रस्ते पक्के हो गए पर दीवारें और रोशन दान तो वही  है
पर न अब वो शरारतें हैं, न छुपे ख़ज़ाने को कोई खंगालने वाला
सिर्फ यादें हैं जो अक्सर सपनों में
सच को रमा देती हैं,
कभी बहला देती हैं तो
कभी बीच रात में दहला देती हैं
मेरे अंदर छुपे उस बचपन को
फिर से हवेली में दौड़ा  देती है!!


Saturday, March 29, 2014

मन के मन में!

मन की दुनिया, मन के दरिया,
मन की नाव और मन के चप्पू
साहिल सुदूर जो दिखे चमकते
कभी दिखे कभी ओझिल हो जाएँ
कभी बहकते, कभी सहमते
किसी पक्षी से आस लगाएं
पल में डरें और पल में छलांग लगाएं
मन के प्राणी, मन के मन में
मण मण के आकार बनायें
किसी को कहें कभी , कभी यूँ ही
खुद से बतियाते हुए पसर जाएँ
सब जब व्यस्त  है पृथ्वी  लीला में
मन ही क्यों मंगल पर जाए
क्यों पड़ा रहे करोड़ों सालों तक
एक सहमा सा अनजान अंतरिक्ष का पत्थर बन कर
या जमा रहे सेंकड़ों मीलों की बर्फीली परत बन कर
यहाँ सब कुछ तो है. शायद सब कुछ
फिर भी यूँ लगें की सूरज  तक तो जाऊं
बिना लाग लपट की, लपट बन जाऊं
अंदर  जलूं बाहर जलूं
जलूं इतना के बृह्मांड रोशन हो जाए
मैं जलूं यहाँ और वहाँ तहां जीवन सृजन हो जाये
कहाँ रात है और कहाँ है दिन
इस से मेरा क्या वास्ता !
कहाँ अपने हैं और कहाँ उनके बिन
इस से मेरा क्या वास्ता
मेरी लपट में जल जाएँ ब्रह्माण्ड भर के कपट
एक निर्मल आकाश रहे
मन के पखेरुओं के लम्बी उड़ान, निर्बाध रहे
इस धरती से उस धरती तक,
इस सौर मंडल से उस अंतरिक्ष तक,
इस जन्म से उन जन्मों तक
कभी बहकते कभी सहमते
मन के दुनिया में मन के प्राणी
चलें, बढ़ें और पार हो जाएँ!




 

Saturday, January 11, 2014

नयी सुबह



जो गुजर गया, कोहराम था,
जो बसर हुआ, तेरा  ही  नाम था,
यूँ हर तरफ थे रास्ते, कि हर तरफ थी मंज़िलें
बाहर उफनते जलजले और भीतर बियाबान था




जो मिले थे दो कदम, वो चले भी साथ दो कदम,
रह रह कर पूछते मुझे, आशियाँ की दास्ताँ,
दुश्मनो कि दास्ताँ, दोस्त की नादानियाँ
हर दो कदम था आशियाँ, हर दो कदम घमासान था




यूँ नहीं कि डर गया, और कुछ भी किया नहीं,
ये किया कि वो किया, और वो भी जो वजह नहीं,
हर कदम हयात से अड़ा, गफलतों का रहनुमां
कब का दिल निकल गया, सांस को पता नहीं




अरमान ही  थे अमानत , बमुश्किल आज़ाद रहे,
साहिल लगा की पास है,  पर  हर मौज़ हम नाशाद रहे,
मिले किसी से जो अगर, मिल कर के  हम यूँ हंस दिए
कुछ लम्हे ही सही, क्यूँ न दिल आबाद रहे!




अब तो सेहर है हो चली, उफक पे लाली लाल है,
कदम अभी तक हैं थके  हुए,पर बदली हुई सी चाल है,
नहीं कि जलजले थम गए, और बादल कभी न आयेंगे,
बस ये कि पयाम मिल गया, और सुलग गयी मशाल है.


ये लौ फिर से लाल है,  अँधेरे मिट ही जाएंगे
संग की  अब फिक्र किसे,  कभी पिघल ही जाएंगे
कोहरा हट ही जाएगा, रस्ते संवर ही जाएंगे,
तेरे नाम से ये हाल है , मिल कर क्या न कर जाएंगे !