Friday, July 27, 2012

बाँस की फाँस लगी, तन मन सब बेचैन था
जब लगी, तब लगी, अब क्यों सब बेचैन था
दिन भर तो मन रहा कामों में मशगूल
कामों में मशगूल की ऐसा, सब कुछ गया था भूल ।

दिन के करतब, दिन के प्रकरण,
न जाने कब, दिल तक गए सरकते
फाँस के मारे, दिन के धारे
न जाने कब आय गए गले तक थे।

सांझ ढली, सृष्टि सिमटी, कर्म कक्ष वीरान हुए
जहाँ थे मेले, जहाँ थी सरगम, मानों यूँ शमसान हुए
इधर झमेले उधर झमेले, दिन भर यूँ घमासान हुए
मन का एका रहा न एका, कतरे कतरे दान हुए।

घर की ओर बढे कदम तो, दिन का दानव शांत हुआ
मैं तो था वही, वही जन्म था, फिर क्यों कर के युगांत हुआ
सुबह से सींचा, दिन भर खींचा, अब तो मन नितांत हुआ  
कदम कदम पर नयी रौशनी, कदम कदम संक्रांत हुआ ।



Tuesday, July 10, 2012

Phir nayi subah

सुबह हुई तो धूप मुझे ढूंढेगी
ब्रह्माण्ड के अनंत में एक सुगबुगाहट  ये भी सही।
अखबार के पन्ने में तो  रोज़मर्रा की बातें रहीं
ज़िन्दगी सांस लेती रही
मैं पन्ने पलटता गया ।

उमस हुई तो हलचल मची
ज़मीं से असमान तक, कुछ उथला उथला सा था
बातें वही रहीं, आवाज़ बदलती गयी
एक दिन बादल भी आये,
अन्दर बाहर सब गहराने लगा
धूप पीछे हटने लगी
मन सिमटने लगा
संभावनाएं बनने लगी
आशंकाए बढ़ने लगीं
कहूँ तो कहूँ कैसे,
बढूँ तो बचूँ कैसे
बस एक बूँद पड़ी मस्तक पर
रंग बदलने लगे
आकार वही रहे, मायने बदलने लगे
उस  बूँद में जो नया ब्रह्माण्ड समाया
इस ब्रहमांड को बदलने लगा ।

बादल तो नीचे थे
मेरे लिए तकिया भर थे
ऊपर से सृष्टि झांकती थी
लाखों योनियों में करोड़ों मनों में
अरबों विचारों में, खरबों संदेशों  में

जहाँ विस्तार था, वहीँ पिघलता सूरज भी था,
जहाँ सिर्फ नाद था, वहीँ फटते तारा मंडल भी थे
जहाँ कोई न था, वहां अगिनत बदलते आयाम थे
एक लम्बी खोज का कठिन दौर था
जो बहा गया वो कोई और था

मैं तो बस यहीं कहीं था
नए अखबार की गंध से सरोबार
पन्ने पलटता हुआ
हर रोज़, हर वक्त
चाय के प्याले पर
सृजन बदलता हुआ।
सुबह हुई तो धूप मुझे ढूंढेगी
ब्रह्माण्ड के अनंत में एक सुगबुगाहट ये भी सही।







Friday, April 06, 2012

मन का बरगद

मन का बरगद
बड़ बड़ बरगद
सुबह का बीजक
सुबह का मंत्रक
नन्हा कोमल,
नया और निर्मल..

ध्यान से बढ़ता
प्यार से बढ़ता
बच्चों की किलकार से बढ़ता
ठंडी ठंडी बयार से बढ़ता

नयी चेतना की आस से बढ़ता
नयी राह की प्यास से बढ़ता
अपनों के संसार से बढ़ता
बढ़ता बढ़ता, सुबह बस बढ़ता.

दिन चढ़ता और बातें बनती
कुछ कुछ बनतीं, कुछ बने न बनतीं
तन तो लेता तीखे तीर
मन कौनसा अपना कम है वीर
मन का बरगद सब कुछ सुनता
सब की बातें, सब के तेवर
सबके गुण, अवगुण के जेवर,
अपनों के अपने, अपनों के सपने,
अपनों के रोने, दुनिया के रोने,
अपने घाव और घाव पे वार
वार पे वार और अनंत दीवार
कभी अंधड़
कभी पतझड़
कभी सूखे  का डर, कभी तूफ़ान का डर
कभी यूँ डर कभी यूँ डर
यूँ जी, कभी यूँ मर
उफ्फ्फ

मन का बरगद
सब कुछ सहता
हर शाम संभालता
हर शाम सहमता

हर पत्ती पर, हर डाली पर
कोमल कोपल और जड़ों की जाली पर
प्यार की मरहम, शाम लगाती
हाल पूछती, नाम पूछती
मन के मन का मान पूछती
राम को राहत, श्याम को चाहत
काम से काम को शाम की चाहत
मन के बरगद को शाम की राहत

रात हुई और सोया बरगद
पत्ते पत्ते में खोया बरगद
जीवन जगता, सोया बरगद,
तन के घावों को सीता बरगद
मन की पीड़ा को पीता बरगद


मन के बरगद का मालिक दूर
अपनी ही दुनिया में चूर
लाख योनियों से भरपूर
कभी एकदम पास, कभी बहुत दूर
मालिक का बरगद, मालिक की माटी
मालिक की दुनिया, मालिक की बातें
बरगद अनजान, काम से काम,
करता जाता, जीता जाता
रिस रिस के जीवन पीता जाता,

जब माती बोलेगी
मालिक आएगा
बरगद पे झूला लगाएगा
कुछ जाना पहचाना गायेगा
मंद मंद मुस्काएगा
तब सब हरित हो जायेगा
सब तीखा घुल जाएगा
हर शाम सुबह हो जाएगी,
हर नाम राम बन जाएगा
मन का बरगद, मालिक मन का,
बिना बने बन जाएगा.

















Tuesday, March 13, 2012

Long road

Madhurima,
Long road with small alleys
enticing and indulgent
in skin, in spirit
everyday, in every ways,
with dust laden shoes,
with wait-riveted eyes,
with prayers full of heart,
with faces full of art,
with crooks that never abide,
with rooks that never subside
 loot that hits the just in face,
the brute, that just finds ways,
it rains;
it drains,
it screams,
still dreams.
vagrant like nothing connects to earth
divine likes stars in the hearth.
narrow.
very messy.
Often times repulsive.
Making the blood boil.
As if the one who designed- the lunatic; still lives on.
on and on and on.

But then,
back then,
there were signs
of broad carriage-ways.
Colour and glimmer that
filled the days.
Shinning chariot, full of rays,
of humble heart and godly praise
around the corner, near and close
would come by the road it happily chose.
back then.
it was all smooth like wind
and clean like rain.
back then.

One day,
sights will converge
around the surge
the narrow and the closed,
the open and the flawed,
the resists and the relays
comes and the delays
will all converge,
when bard meets
Madhurima,
unabashed,
on this long road, with small alleys.