Friday, April 06, 2012

मन का बरगद

मन का बरगद
बड़ बड़ बरगद
सुबह का बीजक
सुबह का मंत्रक
नन्हा कोमल,
नया और निर्मल..

ध्यान से बढ़ता
प्यार से बढ़ता
बच्चों की किलकार से बढ़ता
ठंडी ठंडी बयार से बढ़ता

नयी चेतना की आस से बढ़ता
नयी राह की प्यास से बढ़ता
अपनों के संसार से बढ़ता
बढ़ता बढ़ता, सुबह बस बढ़ता.

दिन चढ़ता और बातें बनती
कुछ कुछ बनतीं, कुछ बने न बनतीं
तन तो लेता तीखे तीर
मन कौनसा अपना कम है वीर
मन का बरगद सब कुछ सुनता
सब की बातें, सब के तेवर
सबके गुण, अवगुण के जेवर,
अपनों के अपने, अपनों के सपने,
अपनों के रोने, दुनिया के रोने,
अपने घाव और घाव पे वार
वार पे वार और अनंत दीवार
कभी अंधड़
कभी पतझड़
कभी सूखे  का डर, कभी तूफ़ान का डर
कभी यूँ डर कभी यूँ डर
यूँ जी, कभी यूँ मर
उफ्फ्फ

मन का बरगद
सब कुछ सहता
हर शाम संभालता
हर शाम सहमता

हर पत्ती पर, हर डाली पर
कोमल कोपल और जड़ों की जाली पर
प्यार की मरहम, शाम लगाती
हाल पूछती, नाम पूछती
मन के मन का मान पूछती
राम को राहत, श्याम को चाहत
काम से काम को शाम की चाहत
मन के बरगद को शाम की राहत

रात हुई और सोया बरगद
पत्ते पत्ते में खोया बरगद
जीवन जगता, सोया बरगद,
तन के घावों को सीता बरगद
मन की पीड़ा को पीता बरगद


मन के बरगद का मालिक दूर
अपनी ही दुनिया में चूर
लाख योनियों से भरपूर
कभी एकदम पास, कभी बहुत दूर
मालिक का बरगद, मालिक की माटी
मालिक की दुनिया, मालिक की बातें
बरगद अनजान, काम से काम,
करता जाता, जीता जाता
रिस रिस के जीवन पीता जाता,

जब माती बोलेगी
मालिक आएगा
बरगद पे झूला लगाएगा
कुछ जाना पहचाना गायेगा
मंद मंद मुस्काएगा
तब सब हरित हो जायेगा
सब तीखा घुल जाएगा
हर शाम सुबह हो जाएगी,
हर नाम राम बन जाएगा
मन का बरगद, मालिक मन का,
बिना बने बन जाएगा.