Friday, July 27, 2012

बाँस की फाँस लगी, तन मन सब बेचैन था
जब लगी, तब लगी, अब क्यों सब बेचैन था
दिन भर तो मन रहा कामों में मशगूल
कामों में मशगूल की ऐसा, सब कुछ गया था भूल ।

दिन के करतब, दिन के प्रकरण,
न जाने कब, दिल तक गए सरकते
फाँस के मारे, दिन के धारे
न जाने कब आय गए गले तक थे।

सांझ ढली, सृष्टि सिमटी, कर्म कक्ष वीरान हुए
जहाँ थे मेले, जहाँ थी सरगम, मानों यूँ शमसान हुए
इधर झमेले उधर झमेले, दिन भर यूँ घमासान हुए
मन का एका रहा न एका, कतरे कतरे दान हुए।

घर की ओर बढे कदम तो, दिन का दानव शांत हुआ
मैं तो था वही, वही जन्म था, फिर क्यों कर के युगांत हुआ
सुबह से सींचा, दिन भर खींचा, अब तो मन नितांत हुआ  
कदम कदम पर नयी रौशनी, कदम कदम संक्रांत हुआ ।



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