Wednesday, August 28, 2013

Translations of some favorite quotes


Because I came, blossoms opened
abundance is abroad, because I am.
At my ear, nightingale spellbinds my heart
I am father to all in the universe.
- Paul Klee

कलियों में निखार आया मुझसे ही
सुदूर बागों में बहार खिली मुझसे ही
नन्ही कोयल की आवाज़ ने  मुझे बाँध लिया
इस ब्रह्माण्ड को विस्तार मैंने   ही दिया ।
-पॉल क्ली
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I can Think, I can Wait and I can Fast.- Siddhartha, by Herman Hesse
सही सोच, कुछ सब्र और भूख से लड़ने की ताकत - इंसान को बहुत आगे ले जाती है!
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One should not cease from exploration
and the end of all our exploring
will be to arrive where we started
and know the place, for the first time- T.S. Eliot

बनकर  फक्कड़ खोजी हमको
दर दर घूमना होगा !
दम फूले या पैर थके हमें
शिखर चूमना होगा

लम्बी राह में कुछ यूँ भी होगा
जहाँ से निकले , वहीँ पहुँच गए
वही ज़मीं, वही आसमां  होगा
सिर्फ हम नए, और नजरिया नया होगा !

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SLOW

Ease the pounding of my heart,
by quietening of my mind.
Help me to know,
the magical restoring power of sleep.
Slow me down, to look at a flower
To chat with an old friend
Or make a new one,
To pat a dog,
To watch a spider build a web
To smile at a child
or read from a good book.
Remind me each day,
that there is more to life, than increasing its speed.

ज़िन्दगी सिर्फ धडकनों का नाम नहीं है
ज़िन्दगी एक खुशनुमा राह है , मुकाम नहीं है!

गर चले दो कदम, दोस्त मिलेंगे,
कुछ गुम  हुई यादों से, कुछ नए बनेंगे
कहीं बच्चे मुस्कुराएँगे, कहीं फूल खिलखिलाएंगे,
कहीं यूँ ही पत्तियों से लटके जाल में उलझ जाएँगे
कहीं किताबों के पन्नों में कुछ पल सुस्ता लेंगे
तो कहीं मुंडेर पर बैठे पक्षी से बतिया लेंगे
तब कहीं ज़िन्दगी की गहराई हम तक
पहुंचेगी  धीरे से, और कहेगी,
 
ज़िन्दगी सिर्फ धडकनों का नाम नहीं है
ज़िन्दगी एक खुशनुमा राह है , मुकाम नहीं है!


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REMEMBER

So that you have a chance to be grateful

Childhood friends, beautiful places
grand mother's gift,
a favour by the road side,
a heart-some counsel
the cool breeze that touched
moments of insight
&
the one who created this beautiful world!


















 

Monday, July 29, 2013

एक गीत ही सुना जाये कोई !

बंधनों के गीतों से
चित्रपट पटे पड़े हैं
सदियों की उमस में
क्यूँ कर यूँ सटे पड़े हैं !

बहती सावन की बयार न सही
एक नन्हा झोंका ही दे जाये कोई
साथ चले न चले
एक गीत ही सुना जाये कोई !

जिन्दगी की कशमकश यारब
इस कदर परेशान करती है
जब तक न जान थकती है
हर दिन हर पल परखती है।

यहाँ कुछ सामान सा रखा है
उसमे जान अटकती  है,
वहां जब असमान फटता है
खुद  कुदरत भी सहमती है।

हजारों जलजले लगातार
बहते हैं बिन रुके  बेजार
पर्वत यूँ ही पिघलते हैं
नज़ारे यूँ ही जलते हैं।

क्या ख्वाब है, क्या खराब है
क्या पानी है क्या शराब है
कुछ साफ़ है, कुछ पाक है,
या सब जो है सिर्फ खाक है।

कुछ अजब सा मंजर है
कुछ नयी सी सिहरन है
न कुछ बोते बनता है,
न कुछ कहेते बनता है।

काश, मेरे से बतियाए कोई
सृजन के गीत तो गाए कोई,
मैं कहूँ न कहूँ , मैं रहूँ न रहूँ,
गीतों से अपनी  साँसों में रमाये कोई!

बहती सावन की बयार न सही
एक नन्हा झोंका ही दे जाये कोई
साथ चले न चले
एक गीत ही सुना जाये कोई !




 

What am I?

I am not the body
Not the mind either.
Not the subtle breath behind the existence
Not even the grand radiance within
Not the bellicose cosmos thrown around
What I am is a body standing on its feet.
Mind, resting on the living brain,
Breath, timed by the rhythms of destiny
now, near and right here,
sense of being without anchors
being central without the periphery
accessing the expanses without proximity
between the poles
between the gravitations fields
on the thin ridges of the universe,
sitting in the middle of waterless lakes of mars
where the rocks stay still for millions of years
without a guest without a host,
without a mast, without a post,
no name, no light,
restless but rested
living, but eternal
breathing but subtle
I am,
the shiny sparkle
of the little droplet of water
just about to give birth
to the beautiful tree
hidden inside the womb of a seed
hidden inside the womb of the earth
hidden inside the womb of the solar system
hidden inside the womb of the visible universe
hidden inside the womb of the invisible stretches of the universe
hidden inside the womb of existence
hidden inside the womb of non-existence
hidden inside the womb of the self.
now and near
visible and clear
A new construct
every moment
of what is
and what is not.


 

Monsoon Phir!!

हवा में नमी नमी रही ,
फिजां कुछ दबी दबी रही,
दिनों में दिन सिमट गए,
सहमे, रातों से लिपट गए।

जो नेकियों की सांस थी
कब तलक रहेगी साथ
जो तल्खियों की आग थी
वो धधक के कर रही थी बात

कदम कदम पे शोर था,
ज़ेहन ज़ेहन में शोर था,
गली अपनी थी शांत शांत
और हर मोड़ पे चोर था

इंसान सब बदल गए
अरमान भी बदल गए
जो जमीं पे रहे, रहे दफ़न
कि आसमान तक बदल गये.

एक हवा चली थी याद है,
एक शमा जली थी याद है,
कुछ खास नहीं, नहीं खास,
पर थी भली सी, याद है.

वो मिले भी तो भर झलक
बात  चली भी तो भर पलक
नूर नूर जेहन हुआ
नूर नूर जहाँ तलक

मन की सिमटी खुली थी  चादर
सुर्ख सा रेगिस्तान हुआ तरातर
लहेरों से लडती वजूद की कश्ती
साहिल बन गयी बीच समंदर।

सिर्फ मिलन नहीं था सब कुछ
कहीं तो रूहों का कलरव था,
बरसों भरते बादल दल का
मिलन तो  संघनन उत्सव था

अब वही नम शाम है
नाम जो था गुमनाम है
जिसके लिए था लहू जिगर
किस कदर सरे  आम है.

जो मिला, बरस गया,
जो रहा, वो तरस गया
सिलसिले यूँ हो गए
रूह रही पर रस गया !







 

Wednesday, May 15, 2013

बाँसुरी

बाँसुरी बजाना कहाँ आता है,
बस यूँ ही कुछ सुर निकल पड़ते हैं,
खेलते टहलते, अकेले चलते,
कभी अटकते, कभी सरल से।

सुबह आती है तो चहक लाती है
सांझ ढलती है  धरती महक जाती है
दिन भर का ताना बाना कुछ यूँ  बनता हैं
कि कदम उठते तो हैं
पर बहक पड़ते हैं, चलते चलते ।

लोग मिलते हैं, बातें चलतीं हैं,
बातें बनती  हैं, बनते न बनती हैं,
कभी पसरते, कभी सहमते,
कभी धीमे  से , कभी गरजते,
साँसें तो साँसें हैं, चलती रहती हैं,
दिन का  दरिया, मन की कश्ती
कहाँ रुके और कब  सुस्ताए
कब यूँ बांसुरी कोई बजाए
कुछ कहे, कुछ सिखाए
कुछ इस पल की, इस जन्म की
कुछ मंगल की, कुछ अनंत की,
कुछ ऐसा हो जाए, की सब खो जाए,
सब खो जाए या सब मिल जाए

पर…

बाँसुरी बजाना कहाँ आता है,
बस यूँ ही कुछ सुर निकल पड़ते हैं,
खेलते टहलते, अकेले चलते,
कभी अटकते, कभी सरल से।




 

Next dawn

Mornings bring the news
that life is all there.
Bird chirp and sun rises.
Bard picks up the harp and surmises,
what could be the new song
to be sung through the day;
ocean of words will now
rise and stay.

Between the muses, amidst the chores
amidst the torrents, rarely on shores,
bard must get up,
and attend to the call.
Mild, wavering, emanating from soul
there it is diminutive,
there it is a whole.

The walk in the alley,
of the well endowed,
right through the shanties
of the disavowed,
there are voices, calling for the feast.
angel of the yore,
tangled by the beast,
misled and distracted,
fallen and protracted,
they must endure,
the karmic churn they bore.
Word of the song,
would blossom into flowers,
hanging from the sky
right till the shore.
Ages pass, waiting for the bard.
everyone yearned,
no one really sang,
every one waited,
no bells rang.

It is time, it is time
bird are chirping, sun is on the rise
bard must rise and play the harp,
in the alley of voices sharp,
Some, it will soothe,
and calm their cycles,
of the timeless binds, in the cage-less jungles
freedom may be far
but worlds will calm
word will balm,
with little hope and a little warmth,
Bard must sing through the age of the alley
Now  on till the dusk,
right through the night and
till the next dawn..

Bard must sing,
right till the next bard.