Monday, July 29, 2013

एक गीत ही सुना जाये कोई !

बंधनों के गीतों से
चित्रपट पटे पड़े हैं
सदियों की उमस में
क्यूँ कर यूँ सटे पड़े हैं !

बहती सावन की बयार न सही
एक नन्हा झोंका ही दे जाये कोई
साथ चले न चले
एक गीत ही सुना जाये कोई !

जिन्दगी की कशमकश यारब
इस कदर परेशान करती है
जब तक न जान थकती है
हर दिन हर पल परखती है।

यहाँ कुछ सामान सा रखा है
उसमे जान अटकती  है,
वहां जब असमान फटता है
खुद  कुदरत भी सहमती है।

हजारों जलजले लगातार
बहते हैं बिन रुके  बेजार
पर्वत यूँ ही पिघलते हैं
नज़ारे यूँ ही जलते हैं।

क्या ख्वाब है, क्या खराब है
क्या पानी है क्या शराब है
कुछ साफ़ है, कुछ पाक है,
या सब जो है सिर्फ खाक है।

कुछ अजब सा मंजर है
कुछ नयी सी सिहरन है
न कुछ बोते बनता है,
न कुछ कहेते बनता है।

काश, मेरे से बतियाए कोई
सृजन के गीत तो गाए कोई,
मैं कहूँ न कहूँ , मैं रहूँ न रहूँ,
गीतों से अपनी  साँसों में रमाये कोई!

बहती सावन की बयार न सही
एक नन्हा झोंका ही दे जाये कोई
साथ चले न चले
एक गीत ही सुना जाये कोई !




 

No comments: