Friday, August 29, 2014

कितने कितने पानियों में कश्ती जाती है
शाम होते ही रह रह के तेरी याद आती है
तन्हाई से रूबरू हो कर मन यूँ मचल जाता है
जैसे दिवार पे बैठा कबूतर फुर्र से उड़ जाता है।

1 comment:

Digamber Naswa said...

वाह क्या बात है बहुत खूब ....