Tuesday, November 29, 2016

जो ख्वाब मैंने बुने थे

जो ख्वाब मैंने बुने थे
वो काफी गहरे और घने थे ,
सहमे सहमे, एक छोटे से शहर से,
जहाँ दुपहर की धूप ठहरी हुई होती थी
और शाम तो सिर्फ दिन का समापन था,
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उनमें ऊँची उड़ाने तो थीं
पर इमारतों की काट छांट नहीं थी
उनमे एक दूसरे का साथ तो था
पर रिश्तों की बन्दर बाँट नहीं थी
रास्ते घुमावदार और सख्त भी दिखते थे
पर सिर्फ गाडी में ही जाया जा सके,
ये बात नहीं थी.
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रंग सिर्फ छह थे, वो भी टिकिया में आते थे
और वह भी जब पुराने ख़त्म हों, तभी नए आते थे
छह भी छह लाख, हो जाते थे
वो रंग, जब मेरे ख़्वाबों से मिल जाते थे
घर से स्कूल तक उनकी खुशबु मेरे ज़हन में रहती
कागज़ धुल जाते, पर दाग नहीं जाते थे ।
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अब किस कोशिश में ये ख्वाब रहते हैं
ऊँचे मकान में रहते हैं, या किसी आसमान में रहते हैं
नीचे भी लोग रहते हैं, इनसे क्यों बेगुमाँ रहते हैं
कभी उतरें तो जमीन पर दिखाई पड़े
हम कौन हैं, क्यों हैं, कहाँ रहते हैं।













ज़िन्दगी चलती गयी

जब साथ चलने की बात हुई
कुछ कही कुछ अनकही भी साथ हुई 
जितना क्षण में भर सकते थे
जितना मन में रख सकते थे,
उतना सब तो तोल दिया  
जितना अग्नि से सांझा था 
जितना रिश्तों  ने बाँधा था 
उनसे ऊपर भी बोल दिया !

धागे, तब तो सिर्फ धागे थे 
हम तो सपनों के भी आगे थे
कभी दौड़ पड़े, कभी हम-कदम रहे 
कभी ठिठक गए कभी सिसक गए 
कभी चमक गए, कभी बहक गए
ज़िन्दगी, ज़िंदगी थी , चलती गयी 
गरजती, पसरती, संभलती गयी  
कुछ मैं बदलता गया  
कुछ तुम बदलती गयी।

कभी सोचा तुमसे बात करूँ
आज करूँ कल रात करूँ. 
अब एक कहानी नयी बुनूँ 
या पुरानी ख़त्म करूँ । 
मन पर एक अनजान पहरा सा था 
या ये समय का साँचा गहरा था 
किस्से किस्से रहे, हकीकत, हम रहे
मौसम तो मौसम थे , 
कभी खुश्क, कभी नम रहे!

ज़िन्दगी सिर्फ बदन नहीं थी, की पिघल जाती
या ख्वाब और फिक्र नहीं, की बहल जाती
उसके अपने रास्ते थे और अपनी मंज़िले
हम तो मुसाफिर थे, चलते गए
दूरियां, नज़दीकियां जगह बदलती गयीं
कुछ मैं ढलता गया, कुछ तुम ढलती गयी।