Saturday, August 26, 2017

आखों में ख्वाब रहने दो

हवाओं के थपेड़ों से, लड़ते चिराग रहने दो
हर कदम पर मुश्किल, हर कदम पे आग रहने दो 
ज़िन्दगी गर है, तो रास्ते भी होंगे हज़ार 
बाज़ुओं में ताकत, और आखों में ख्वाब रहने दो । 

पत्थर हो, तो मुमकिन है, बारिशें सह जाओ 
इंसान हो तो भीगो , पानियों में बह जाओ 
सांस है, तो मौसम भी बंधें हैं क़यामत से,
रूह को वजूद की पतवार रहने दो ।

जब डर लगे कभी, सहमो सिहर जाओ
डर को समझो, परखो, दो पल वहीँ रुक जाओ,
मन की सियाह गुफाओं और घने जंगलों में,
अडिग विश्वास की कलियाँ खिलने दो ।

जो दूर से दिखता है, वो बादलों का गावँ  है
यहां रुई के मकान और हवा के इंसान हैं
बरसेंगे, चमकेंगे या बस उड़ चलेंगे जब चाहे
तब तक तो बनाते सपनों के सामान रहने दो ।







Tuesday, August 22, 2017

जब ज़िन्दगी खुद सीने से लगा लेती है

जब ज़िन्दगी खुद सीने से लगा लेती है
थकते मुसाफिर को, पंख लगा देती है
जिसको हर कदम पर मिलती हो ज़िल्लतें
उसको मनचाही राहों का मेहमान बना देती है।

कोशिशें लाख होती हैं, तमन्नाएं लाख पलती हैं
पर मुकम्मल होना दूर, हर एक सांस जलती हैं
जब अपने मुँह छुपाते हैं, पराये दिशा भटकाते हैं
जब सुबह सूरज के दर्शन से, सिर्फ आहें निकलतीं हैं|

जब दिन भर के परिश्रम का,
सारांश सिर्फ इतना होता हैं,
शरीर थकता हैं, पल पल गिरता हैं
मन बस प्र्श्न उठाता है, रातों से डराता है|

जब कई साल यूँही बीत जाते हैं
निराशाओं के अँधेरे, लगभग जीत जाते हैं
तब कहीं तो अंतरतम, के पहचाने से एक कोने से,
आशा की एक चिंगारी सुलगती है,
हवा कुछ भी नहीं होती, पर न जाने क्यों भभकती है |

इंसान नहीं बदलता है, न सामान बदलते हैं,
बदलतीं सिर्फ हवाएं हैं,  जनम भर की दुआएं हैं
तब एक कदम इंसान का, एक धरती चलाता हैं
नए पंखों की ताकत से, कई और को उठाता है|

ये एक अजब किमया है,
एक  ज़रूरी जज़बा है
जो हर इंसान को हासिल है,
और हर सांस में शामिल है!!
























Saturday, April 15, 2017

एक जीवन ऐसा भी पाऊं,


एक कदम चलूँ तो धरती समेट  लूँ
एक गहरी सांस लूँ और हवाएं लपेट लूँ
जहाँ नज़र जाए, उस के अंतिम छोर तलक,
अदृश्य ब्रह्माण्ड में लीन अगिनित आकाश गंगाओं से
छन  कर आते मद्धिम, बिखरे, टूटे, लाचार संकेतों को
अपने अंतरतम के विशाल दालानों में विश्राम दूँ ।

जो एक टूटा तारा भी अपनी लकीर से हिले
जो सृष्टि का एक आवारा कण भी अनंत में विलीन हो
तो धड़कन बढ़ा  जाए
एक सूर्य जले
एक सूर्य बने नया
एक चाँद चमके ज़मीन पर,
एक चाँद कहीं पड़ा रहे, सदियों से सुस्ताये
नए रहस्य बनें, जो कभी पकड़ में न आएं
नए रहस्य खुलें जो, अब तक के ज्ञान को शर्माएं ।

कुछ नया देखूं , कुछ नया न पाऊं,
जो है, उसके अंत तक पहुंचूं,
पर पार  न जाऊं,
एक जीवन ऐसा भी पाऊं,
जब में जीव, निर्जीव के बीच खड़ा
ब्रह्माण्ड नापूं

और जब रौशनी हो,
तो मैं कौन, और रौशनी क्या?







Friday, March 31, 2017

तेरे निशाँ मिलने लगे

ढूंढने तो जाता रहा हर दिन,
चलता रहा उस तपिश में हर दिन
कभी ठिठक के ठहरा, तो कभी झिझक से चुप रहा
कहीं तेरा नाम पूछा, तो कहीं साये देख कर सिहर गया
कुछ बतियाये कुछ कसमसाये,
कुछ अनदेखा कर आगे बढ़ गए
दिन तो दिन थे, ढल गए , रातों में छाले और बढ़ गए।

मालूम तो था, मिलेंगे, पर कब होगा
क्या साथ लूँ , क्या छोड़ दूँ  कि सफर लंबा होगा
किस रूप में तू मिलेगी, कैसे मिलेगी, क्या होगा
नाम ही काफी होगा या युग-गान वर्णित होगा
सिर्फ प्रश्न थे,  और चलना था
सूरज से पूछे बिना, चाँद के आगे निकलना था।

पर कहीं तो मन थकने लगा, शरीर अकड़ने लगा,
प्रश्न अठखेलियों में बदलने लगे
और कदम शहर की गलियों में भटकने लगे
मन की उधेड़बुन अब ठहाकों में बदलने लगी
तेरी यादों के रोशनदानों में रौशनी कम  हुई
और कबूतर ज्यादा बैठने लगे.

जो दिखे नहीं वो कहाँ सवेरा?
जो मिले नहीं वो कहाँ है मेरा ?
सूक्ष्म सूख गया,
भीष्म गिर गया
शहर शहर रहा
मुसाफिर भटक गया.

पर शायद तुझे ये मंज़ूर न था
खुमारी तो थी, मगर चूर न था
रह रह के ठहाकों के बीच तेरी हूक सी उठती रही
भाग कर छत पर, कभी बहकता कभी सहमता,
कभी रोकर कभी चिल्ला कर,
कभी चुप चाप,
तेरी ओर फिर से चलने लगा

अब धीरे धीरे मंज़र बदलने लगे
जंगलों से मकानों में ,
फकीरों से, लकीरों में,
तेरे निशाँ मिलने लगे
मिलना, एक सम्भावना होने लगी
रूह से तेरे लिए
दुआएं फिर निकलने लगीं ।


अब ज़मीन से मीलों दूर,
मेरा सफर जारी है
उपकरण तो वही है
बदली सी कीमियाकारी है।

मैं नभ-गंगा के दूसरे छौर से,
जब तुम्हें तुम्हारे नाम से यकायक पुकारूँगा
तब तुम दौड़ी चली आओगी ना, मधुरिमा ?