Saturday, April 15, 2017

एक जीवन ऐसा भी पाऊं,


एक कदम चलूँ तो धरती समेट  लूँ
एक गहरी सांस लूँ और हवाएं लपेट लूँ
जहाँ नज़र जाए, उस के अंतिम छोर तलक,
अदृश्य ब्रह्माण्ड में लीन अगिनित आकाश गंगाओं से
छन  कर आते मद्धिम, बिखरे, टूटे, लाचार संकेतों को
अपने अंतरतम के विशाल दालानों में विश्राम दूँ ।

जो एक टूटा तारा भी अपनी लकीर से हिले
जो सृष्टि का एक आवारा कण भी अनंत में विलीन हो
तो धड़कन बढ़ा  जाए
एक सूर्य जले
एक सूर्य बने नया
एक चाँद चमके ज़मीन पर,
एक चाँद कहीं पड़ा रहे, सदियों से सुस्ताये
नए रहस्य बनें, जो कभी पकड़ में न आएं
नए रहस्य खुलें जो, अब तक के ज्ञान को शर्माएं ।

कुछ नया देखूं , कुछ नया न पाऊं,
जो है, उसके अंत तक पहुंचूं,
पर पार  न जाऊं,
एक जीवन ऐसा भी पाऊं,
जब में जीव, निर्जीव के बीच खड़ा
ब्रह्माण्ड नापूं

और जब रौशनी हो,
तो मैं कौन, और रौशनी क्या?







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